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रविवार, 17 अक्तूबर 2010

poem-vijay ka virat parv 'vijaydashmi'

''असत्य पर सत्य की; अभिमान पर स्वाभिमान की;
अंधकार पर प्रकाश की; पाप पर पुण्य की'
अमंगल पर मंगल की; अनीति पर नीति की;
      '  विजय का विराट पर्व'
क्रूरता पर करुना की ; वासना पर प्रेम की ;
उदंडता पर अनुशासन की; निर्लज्जता पर मर्यादा की;
विषाद पर आनंद की ;द्वेष पर sahishunta की;
         'विजय का विराट पर्व'
निष्ठुरता पर संवेदनशीलता की; क्रोध पर क्षमा की;
तामसिकता पर सात्विकता की; लोकपीडा पर लोकमंगल की;
दुश्चरित्रता पर sachchritrta की; संकुचित पर उदात्त की;
            'विजय ka विराट पर्व'
भक्षक पर रक्षक की; दुष्ट पर दयावान की;
शत्रुत्त्व पर बन्धुत्त्व की; मै पर हम की;
         रावन पर shri 'राम' की
      'विजय का विराट पर्व'
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1 टिप्पणी:

shalini kaushik ने कहा…

mastishk par hardy ki vijay ka parv dil ko gahrai tak chhu gai.