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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

poem--duvidha

अनंत इच्छाएं ;लालसाएं
असंख्य स्वप्न;सपनें
अभेद्य लक्ष्य;जीवन-सुख
पूर्ण karun तो कैसे?
निराशा की अँधेरी कोठरी
उसमे फंसी मेरी आशाएं;
मै अत्यंत विवश ;स्वतंत्र
करूँ तो कैसे?
असीम आकाश सम
मेरी आकांशाओं का विस्तार
उन्हें जीवन कक्ष में
समेटूं तो कैसे?
अज्ञानी; विवेकहीन
nirutsahi;sahasviheen
मृत-ह्रदय को संचालित
करूँ तो कैसे ?
नयनों में शून्यता
अश्रू-रहित;शुष्क
सरिता सम इन्हें
सरस करूँ तो कैसे?
गुलाबी pankhudyon से ओष्ट
किन्तु मुस्कान से रिक्त;
इन्हें उमंगित
करूँ तो कैसे?
असमंजस;किन्क्रत्वय्विमूद्ता
से युक्त मेरा मस्तिष्क
विचारों की दामिनी se
तरंगित करूँ तो कैसे?
रुके हुए पग
छालें है पड़े हुए;
कंटक युक्त जीवन
पथ पर आगे बढूँ
तो कैसे?

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