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गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

poem-ek prashn

दहेज़- प्रथा पर
कितने ही निबंध
लिखें होंगें उसने;
कितना ही बुरा
कहा होगा;
लेकिन 'वो'
कली फिर से मसल
दी गई;
नाम 'पूनम' हो या 'छवि'
या कुछ और;
कब रुकेगा
कत्लों का
यह दौर?पूछती
है हर बेटी
इस मूक समाज से;
जो विरोध में
आते हैं दहेज़-हत्या के
क्या निजी तौर पर वे
भी नहीं लेते 'दहेज़'?
एक प्रश्न
जिसका नहीं है
आज किसी के पास
संतोषजनक जवाब....

1 टिप्पणी:

mahendra verma ने कहा…

एक संवेदनशील विषय पर मार्मिक कविता...सचमुच इस ज्वलंत प्रश्न का संतोषजनक उत्तर शायद ही किसी के पास हो।