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मंगलवार, 21 जून 2011

मेरे वालिद

मेरे  वालिद 
ग़मों को ठोकरें मिटटी में मिला ही देती ,
मेरे वालिद ने आगे बढ़ के मुझे थाम लिया .

मुझे वजूद मिला एक नयी पहचान मिली ,
मेरे वालिद ने मुझे जबसे अपना नाम दिया .



मेरी नादानियों पर सख्त हो डांटा मुझको;
मेरे वालिद ने हरेक फ़र्ज़ को अंजाम दिया .

अपनी मजबूरियों को दिल में छुपाकर रखा ;
मेरे वालिद ने रोज़ ऐसा इम्तिहान दिया .

खुदा का शुक्र है जो मुझपे की रहमत ऐसी ;
मेरे वालिद के दिल में मेरे लिए प्यार दिया .
                                                          शिखा कौशिक 


9 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

अपनी मजबूरियों को दिल में छुपाकर रखा ; मेरे वालिद ने रोज़ ऐसा इम्तिहान दिया .
bahut sundar v marmik abhivyakti.badhai.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मेरी नादानियों पर सख्त हो डांटा मुझको;
मेरे वालिद ने हरेक फ़र्ज़ को अंजाम दिया

Kya bat... Bahut hi sunder panktiyan

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति

आशुतोष की कलम ने कहा…

पिता का योगदान हर व्यक्ति के जीवन का संबल होता है..
आप भाग्यशालियों में से एक हैं..
बधाइयाँ

वन्दना ने कहा…

पिता को समर्पित बहुत सुन्दर रचना।

Manish Kr. Khedawat ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना शिखा ज़ी ! बधाई !

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राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

Anita ने कहा…

उर्दू भाषा वैसे ही मिठास से भरी है फिर आपने वालिद जैसे खूबसूरत रिश्ते पर लिख कर उसे और भी सुंदर बना दिया है... सुभानअल्लाह!

Sawai SIingh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही सुन्दर.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और सशक्त रचना!