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बुधवार, 5 जनवरी 2011

स्पंदन

दीवार से नीचे लटकती 
      ''बेल ''
कभी स्थिर -कभी हवा 
के झोंके से चंचल,
छोटे -बड़े पत्ते 
मानों उसकी अभिलाषाओं 
के प्रतीक ,
लम्बी लम्बी टहनियां  
मानों उसकी जीवन 
शक्ति क़ा संकेत ;
जब हिलती हैं 
तो लगता है कि 
मुस्कुरा रही हैं ;
जब ठहरी  रहती हैं
तो मानो  उदास हो जाती  हैं ;
क्या इनमे भी जीवन है ?
ये एक जिज्ञासा सिर उठाती है ;
जो तुरंत ही शांत
भी हो जाती है ;
जब बेल की एक टहनी
लचक कर मेरे चेहरे
से छू जाती है ;
मानो यह कह जाती
है -हम भी तेरे जैसे ही है
''हम में भी है स्पंदन ''

7 टिप्‍पणियां:

shalini kaushik ने कहा…

prakriti ki har vah cheez jo hame dikhai deti hai usme jeevan hai aap ne mahsoos kiya yadi aur bhi mahsoos karen to shayad prikriti ka vinash rook jaye.bahut sunder kavita...

वन्दना ने कहा…

सच कहा हर चीज़ मे स्पंदन होता है सिर्फ़ महसूसने की जरूरत होती है।

प्रीति टेलर ने कहा…

bahut khub ....

Anita ने कहा…

प्रकृति के सुंदर चित्रण के साथ एक भाव पूर्ण कृति!

Harman ने कहा…

bahut hi khoob..
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प्रदीप कुमार ने कहा…

bahut acha..
mere "MERI KAVITA" blog me bhi aayen.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर इस स्पंदन को महसूस करने से ही संवेदनशीलता आती है।