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रविवार, 6 नवंबर 2011

हे देव !! जाग जाइये ! जाग जाइये !!


हे देव !! जाग जाइये ! जाग जाइये !!


हे लक्ष्मीपति   !   हे श्री नारायण  !
आज कार्तिक-मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी है;
चार मास   व्यतीत हुए;
शयन-समय समाप्त हुआ;
हे सृष्टि के पालनहार !
जाग जाइये !जाग जाइये!!
****************  ******************
असुरों क़ा संहार करिए;
हम सबका उद्धार करिए;
मिटा दीजिये अज्ञान-तम;
जीव-जगत को बना दीजिये सुदरतम;
कल्याण कीजिये  !!
हे करुणासागर  !!
जाग जाइये ! जाग जाइये!
**************  ****************
हम जानते है!
आपकी निद्रा ''योग-निद्रा'' थी;
जिसमे आप अंतस में
निहार रहे थे सम्पूर्ण  ब्रह्माण्ड   को ;
करते थे नियोजन तब भी;
प्रभु बलि के द्वार से
अर्थात  पाताल-लोक से
लौट आइये !
हे देव !! जाग जाइये ! जाग जाइये !!

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

ये दुनिया मात्र मर्दों की नहीं है !


मेरी एक पोस्ट ''एक बेटी का परम्परा के मुंह पर करारा तमाचा  '' पर ''नव भारत टाइम्स' के मेरे ब्लॉग ''सच  बोलना चाहिए'' पर यह टिप्पणी आई थी
'' ग़लत किया उस लड़की ने परंपराव को तोड़ना नहीं चाहिए औरत कभी भी अग्नि नहिंज दे सकती , उस व्यक्ति की आत्मा को कभी भी मोख नहीं मिल सकता आज कल की लड़कियाँ अपपने आप को कुछ ज्या दा है आयेज समझती है ,लेकिन यह दुनिया मर्दो की है और उनकी है रहेगी 
जिसका जवाब मैं इन शब्दों में उन कुंठित सोच वाले पुरुषों को देना  चाहूंगी जो एक स्त्री की कोख से जन्म लेकर भी इस दुनिया को मात्र पुरुषों की कहने में कोई शर्म महसूस नहीं करते . 

''ये दुनिया मर्दों की है ''
कुंठिंत पुरुष-दंभ की ललकार 
पर स्त्री घुटने टेककर 
कैसे कर ले स्वीकार ?

जिस कोख में पला;जन्मा 
पाए जिससे  संस्कार 
उसी स्त्री की महत्ता ;गरिमा 
को कैसे रहा नकार ?

कभी नहीं माँगा;देती आई 
ममता,स्नेह ;प्रेम-दुलार 
उस नारी  को नीच मानना
बुद्धि  का अंधकार  

''अग्नि -परीक्षा ''को उत्सुक 
''सती ''की करता है जयकार !
फिर पुरुष कैसे कहता
स्त्री को नहीं ''अग्नि ''
देने का अधिकार ?

सेवा,समर्पण,शोषण 
बस इसकी स्त्री हक़दार ?
कृतघ्न पुरुष अब संभल जरा 
सुन नारी -मन चीत्कार 

आँख दिखाना ,धमकाना 
रख दे अपने हथियार  ! 
इनके  विरुद्ध खड़ी है नारी 
लेकर मेधा-तलवार 

खोलो अपनी सोच की गांठें
नारी शक्ति का अवतार 
नर-नारी के उचित मेल से 
सृष्टि  का विस्तार .
                            शिखा कौशिक 
                      [विख्यात ]





शनिवार, 20 अगस्त 2011

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !


श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
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राम बनकर आते है; कृष्ण बनकर आते है;
कभी मौहम्मद;नानक; ईसा बनकर आते हैं;
वो प्रभु संसार का दुःख मिटाने आते हैं.
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पाप की कीचड में भी
पुण्य -कमल खिल उठता है;
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मूक के मुख से मधुर
गायन का स्वर निकलता है;
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दुष्ट के दुष्कर्मों का संहार करने आते हैं;
वो प्रभु संसार का दुःख मिटाने आते हैं.
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उनके आगमन से
घट जाता तम का अहम् ;
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ज्ञान ज्योति से चमक उठते 
अज्ञान से अन्धें नयन ,
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आस के बुझे  दीपक  जगाने आते हैं;
वो प्रभु संसार का दुःख मिटाने आते हैं.
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                                       शिखा कौशिक 
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रविवार, 7 अगस्त 2011

मित्रता एक वरदान !


मित्रता एक वरदान !
                                      
मित्रता का भाव मानव के लिए वरदान है ;
जो नहीं ये जानता वो मूर्ख है ;नादान है .

देखकर दुःख मित्र का जिसका ह्रदय होता विकल ;
त्याग देता मित्र हित पल में सदा जो सुख सकल ,
है वही सच्चा सखा धरती पे वो भगवान है .
मित्रता का भाव ..................................

पाप करने से सदा मित्र को है रोकता ;
हर त्रुटि पर ज्येष्ठ भ्राता सम उसे है टोकता ,
मित्र ही सच्चा हितैषी -सुग्रीव के श्री राम हैं .
मित्रता का भाव ............................

जो निराशा के समय प्रफुल्ल कर देता ह्रदय ;
छीन कर चिंता सभी जो मित्र को करता अभय ,
निर्मल ह्रदय से युक्त मित्र पुण्य पावन धाम है .
मित्रता का भाव ..........................

दौड़कर आ जाता है कृष्णा की एक पुकार पर ;
सारथी बनकर सिखाता -''शत्रु का संहार कर '',
जो सुदामा को भी देता आगे बढ सम्मान है .
मित्रता का भाव .................................

जो नराधम को बना देता नरों में श्रेष्ठ है ;
मित्र का कल्याण हो इस हेतु ही सचेष्ट है ,
मित्र की रक्षार्थ उत्सर्ग करता प्राण है .
मित्रता का भाव ...................................

जात-पात;ऊँच-नीच -वो कभी न मानता ;
मित्र को बस मित्र के ही रूप में पहचानता ,
मित्र मित्र है ;न वो निर्धन न वो धनवान है .
मित्रता का भाव ......................................

मित्र के उत्कर्ष पर जिसका है सीना फूलता ;
मित्र के सुख देखकर मन ख़ुशी से झूमता ,
मित्रता में द्वेष का होता नहीं स्थान है .
मित्रता का भाव ................................

जो विपत्ति में फंसे मित्र को न भूलता ;
मित्र हित की शाख पर जिस का ह्रदय है झूलता ,
दुःख की घड़ी में साथ देना मित्र की पहचान है .
मित्रता का भाव ..............................

शिखा कौशिक

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

स्त्री कर रही है ऐलान !

स्त्री कर रही है ऐलान !

हजारों वर्षों की
यात्रा करके आज
पहुंची है स्त्री यह
कहने की स्थिति में
''मैं भी एक अलग व्यक्तित्व हूँ ''
मेरा भी समाज में अलग अस्तित्व है .

मनु ने पिता ,पति
पुत्र की दीवारों में
किया कैद स्त्री को ,
पुत्री,पत्नी ,माता और
बहन के रूप में सर्वस्व
न्यौछावर करती हुई
अबला बना दी गयी
''नर की शक्ति नारी ''

केवल देह मान  ली गयी
और पुरुष ने घोषणा की
''नारी मेरी संपत्ति है ''
कभी मर्यादा व्  लोकरंजन के नाम पर
वन-वन भटकाई गयी ,
कभी जुए में दाव पर लगा दी गयी
नारी की अस्मिता ;
फिर कैसे विश्वास करें
की भारतीय संस्कृति में
सम्मानित स्थान  दिया गया
है स्त्री को ?

ये ठीक है कि
आज भी नारी देह का  
शोषण जारी है ;
आज भी नर नारी को मानता है
अपनी दासी
लेकिन खुल चुकी हैं
कुछ खिड़कियाँ
पितृ- सत्तात्मकता   की
मजबूत दीवारों में ,
जहाँ से झांक कर स्त्री कर रही
है ऐलान
''मैं भी एक अलग व्यक्तित्व हूँ ''
मेरा भी समाज में पृथक
अस्तित्व है .
                          शिखा कौशिक


शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

माँ ! वो पारस है !

माँ  ! वो पारस है !

कभी माँ के थके पैरों को दबा कर देखो 
ख़ुशी जन्नत की अपने दिल में तुम पा जाओगे .

जिसने देकर के थपकी सुलाया है तुम्हे 
क्या उसे दर्द देकर चैन से सो पाओगे ?

करीब बैठकर माँ की नसीहतें भी सुनो 
कई गुस्ताखियाँ   करने से तुम बच जाओगे .

उसने हर फ़र्ज़ निभाया है बड़ी तबियत से 
उसके हिस्से का क्या आराम तुम दे पाओगे ?

उम्रदराज़ हुई चल नहीं वो पाती है 
उसे क्या छोड़ पीछे आगे तुम बढ जाओगे ?

जिसने कुर्बान करी अपनी हर ख़ुशी तुम पर 
उसके होठों पे क्या मुस्कान सजा पाओगे ?

तुम्हे छू कर  के मिटटी से बनाती सोना 
माँ ! वो पारस है उसे भूल कैसे पाओगे ?

                               शिखा कौशिक 

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अफ़सोस

अफ़सोस 

''मैं''
केवल एक देह नहीं 
मुझमे भी प्राण हैं .
 मैं नहीं भोग की वस्तु
मेरा भी स्वाभिमान .

मेरे नयन  मात्र झील 
से गहरे नहीं ;
इनमे गहराई  है 
पुरुष के अंतर्मन को 
समझने की ,
मेरे होंठ मात्र फूल की
 पंखुडियां नहीं ;ये खुलते
हैं जिह्वा जब बोलती है 
भाषा उलझने की .

मेरा ह्रदय मोम सा 
कोमल नहीं ;इसमें भावनाओं 
का ज्वालामुखी है 
धधकता हुआ ,
मेरे पास भी है मस्तिष्क 
जिसमे है विचार व् तर्कों 
का उपवन 
महकता हुआ .

मेरा भी वजूद है 
मैं नहीं केवल छाया 
पर अफ़सोस पुरुष 
इतना बुद्धिमान होकर भी 
कभी ये समझ 
नहीं पाया .

                                                   शिखा कौशिक  
                          http://shikhakaushik666.blogspot.com

सोमवार, 6 जून 2011

जंग

क्या जरूरत है हमें तोप की - तलवार की 
जंग लडनी है हमें तो नफरतों पर प्यार की .

इसमें हर इन्सान के दिल से मिटाने है गिले ;
बंद हो अब साजिशें अपनों के क़त्ल-ओ-आम की .
क्या जरूरत ....

है बहुत मुमकिन की हम हार जाएँ जंग में ;
ये घडी है सब्र की और इम्तिहान की .
क्या जरूरत ....

कल हमें काटा था उसने ;आज हम काटें उसे 
छोड़ दो ये जिद जरा कीमत तो समझो जान की .
क्या जरूरत .....
                                     शिखा कौशिक 

जंग 

गुरुवार, 2 जून 2011

हम सब की माएं

ये ऐसा बंधन है कभी टूट नहीं सकता ,
ये ऐसी दौलत है कोई लूट नहीं सकता ,
जीवन भर देती हम सबको दुआएं 
हम सब की माएं ;हम सबकी माएं.
वो अपना निवाला बच्चे  को दे देती ,
बदले में बच्चे  से भला माँ है क्या लेती ?
अपने पर ले लेती वो सारी बलाएँ ,
हम सबकी माएं,हम सब की माएं 

जो भटके कभी हम वो राह दिखाती,
जीने का सलीका माँ ही तो सिखाती 
ममता के मोती बच्चों पे लुटाएं ,
हम सबकी माएं.हम सबकी माएं .

जो गोद में लेकर रोते को हँसाती;
जो ऊँगली पकड़कर चलना है सिखाती ,
जो खुद जगती रहकर बच्चे को सुलाएं 
हम सब की माएं ,हम सबकी माएं .  
                                                      शिखा कौशिक 

बुधवार, 1 जून 2011

लड़की के जन्म पर ..

लड़की के जन्म पर .. 

लड़की के जन्म पर 
उदास क्यों हो जाते हैं 
परिवारीजन ?
क्यों उड़ जाती है 
रौनक चेहरों की
और क्यों हो जाती है 
नए मेहमान के आने की ख़ुशी कम ?
शायद सबसे पहले मन 
में आता है ये 
हमसे जुदा होकर 
चली जाएगी पराए घर ,
फिर एकाएक घेर लेती 
है दहेज़ की फ़िक्र ;
याद आने लगती हैं 
बहन बुआ ,पड़ोस की 
पूनम-छवि के साथ घटी 
अमानवीय घटनाएँ !
ससुराल के नाम पर 
दिखने लगती है 
काले पानी की सजा ;
फिर शायद ह्रदय में यह 
भय भी आता है कि
हमारी बिटिया को भी 
सहने होंगे समाज के 
कठोर ताने -''सावधान 
तुम एक लड़की हो ''
किशोरी बनते ही तुम एक देह 
मात्र रह जाओगी ,
पास से गुजरता पुरुष 
तुम पर कस सकता है तंज 
''यू आर सेक्सी ''
इतने पर भी तुम गौर न करो तो 
एक तरफ़ा प्यार के नाम पर 
तुम्हे हासिल करना चाहेगा ,
और हासिल न कर सका तो 
पराजय की आग में स्वयं 
जलते हुए तुम पर तेजाब 
फेंकने से भी नहीं हिचकिचाएगा ;
इतने भय तुम्हारे जन्म के साथ 
ही जुड़ जाते हैं इसीलिए 
शायद लड़की के जन्म पर 
परिवारीजन 
उदास हो जाते हैं .
                                 शिखा कौशिक 

शनिवार, 28 मई 2011

मेरी बेटी

मेरी  बेटी                                               ''गूगल से साभार ''

फूल सी प्यारी है वो और मखमल सी नरम ,
है चपल तितली के जैसी ;रेशमी उसकी छुअन ,
दौड़ती खरगोश सी,कोयल के जैसी बोलती,
मीठी-मीठी बातों से कानों में अमृत घोलती ,
खिलखिलाती धूप-सम ;मुस्कुराती चांदनी,
बाँटती खुशियों के मोती ,क्रोध में है दामिनी ,
वो क्षमा है ,वो शिवा है,वो है काली-भैरवी , 
वो जया है ;वो है दुर्गा,वो है सारा-वाभ्रवी,
मुझसे ही जन्मी है वो ,मेरा ही तो रूप है ,
सृष्टि की संचालिका ,अनुपम है वो अनूप है .
                                         शिखा कौशिक



गुरुवार, 19 मई 2011

सबसे खुशनसीब

सबसे   खुशनसीब 

औलाद जो सदा माँ के करीब  है ;
सारी दुनिया में वो ही खुशनसीब  है .

जिसको परवाह नहीं माँ के सुकून की ;
शैतान का वो बंदा खुद अपना रकीब है .

दौलतें माँ की दुआओं की नहीं सहेजता 
इंसान ज़माने में वो सबसे गरीब है .

जो लबों पे माँ के मुस्कान सजा दे 
दिन रात उस बन्दे के दिल में मनती ईद है .

माँ जो खफा कभी हुई गम-ए -बीमार हो गए ;
माँ की दुआ की हर दवा इसमें मुफीद है .

है शुक्र उस खुदा का जिसने बनाई माँ !
मुबारक हरेक लम्हा जब उसकी होती दीद है .
   
                         शिखा कौशिक 




रविवार, 24 अप्रैल 2011

जो बिछड़ जाते हैं ..

जो  बिछड़  जाते  हैं  ..मेरी आवाज में 
जो बिछड़ जाते हैं हमेशा के लिए 
छोड़ जाते हैं बस यादों के दिए 
जिनकी रौशनी में उनका साथ पाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

जिन्दगी कितने काँटों से है भरी 
हर दिन कर रही हम सब से मसखरी 
जो चला था घर से मुस्कुराकर  के अभी 
एक हादसा हुआ और आया न कभी 
साथी राहों में ऐसे ही छूट जाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

रोज सुबह होती और शाम ढलती है 
जिन्दगी की यू ही रफ़्तार चलती है 
वो सुबह और शाम कितनी जालिम है 
जब किसी अपने की साँस थमती है 
हम ग़मों की आग में जिन्दा जल जाते हैं .
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .
              शिखा कौशिक 

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !

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राम बनकर आते है; कृष्ण बनकर आते है;
कभी मौहम्मद;नानक; ईसा बनकर आते हैं;
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पुण्य -कमल खिल उठता है;
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मूक के मुख से मधुर
गायन का स्वर निकलता है;
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वो प्रभु संसार का दुःख मिटाने आते हैं.
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घट जाता तम का अहम् ;
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ज्ञान ज्योति से चमक उठते 
अज्ञान से अन्धें नयन में
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वो प्रभु संसार का दुःख मिटाने आते हैं.
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