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रविवार, 9 दिसंबर 2012

''दोस्त आपकी ही हूँ ''

 

मुस्कुराने को कहूँ तो मुस्कुरा भी दीजिये ;
हाल जो पूछूं तुम्हारा ;गम सुना भी दीजिये ,
मैं नहीं उनमें से कोई ;
आये और आकर चल दिए ,
मैं जो आऊं घर तुम्हारे 
ठहराने  की जहमत कीजिये .
मैं नहीं पीती हूँ साकी ;
ये तुम्हे मालूम है ;
तो मुझे चाय क़ा प्याला  ;
शक्कर मिला कर दीजिये .
सोचते तो होगे तुम ;
कैसी ये बेशर्म है ?
रोज आ जाती है
अफ़साने सुनाने के लिए ;
''दोस्त आपकी ही हूँ ''
ये सोच कर सह लीजिये .
मुस्कुराने को कहूँ तो
मुस्कुरा भी दीजिये .
                           शिखा कौशिक 'नूतन '

रविवार, 11 मार्च 2012

भारत में लोकतंत्र है ?


कौन कह सकता भला भारत में लोकतंत्र   है ?
माफिया का राज अब  नित नया षड्यंत्र   है  .






जो गिरेबां  की तरफ बढ़ आये हाथ न्याय   का  ;
''काट दो उस   हाथ  को '' ये  अपराधियों  का  मन्त्र   है  .



जो  भी  ईमानदार हो उसको जला   दो  आग  में  ;
कुछ  भी  यहाँ करने  को बेईमान  अब स्वतंत्र है  .





देश जो शांति का था कभी स्थाई सदन ;

आज पलटा रूप हथियारों का  ये संयंत्र है  .


माफिया हैं  हुक्मरान या  हुक्मरान  माफिया 
सच  कहे   कैसे  जुबां ?  भयभीत  स्वरयंत्र  है  .


                                                        SHIKHA  KAUSHIK