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बुधवार, 7 नवंबर 2012

'' हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ''

'' हुज़ूर इस नाचीज़  की गुस्ताखी माफ़ हो ''




हुज़ूर इस नाचीज़  की गुस्ताखी माफ़ हो ,
 आज मुंह खोलूँगी हर गुस्ताखी माफ़ हो !


दूँगी सबूत आपको पाकीज़गी का मैं ,
पर पहले करें साबित आप पाक़-साफ़ हो !


मुझ पर लगायें बंदिशें जितनी भी आप चाहें ,
खुद पर लगाये जाने के भी ना खिलाफ हो !

मुझको सिखाना इल्म लियाकत का शबोरोज़ ,
पर पहले याद इसका खुद अलिफ़-काफ़ हो !

खुद को खुदा बनना 'नूतन' का छोड़ दो ,
जल्द दूर आपकी जाबिर ये जाफ़ हो !

                                                  शिखा कौशिक 'नूतन'




6 टिप्‍पणियां:

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुन्दर भावों से सजी ग़ज़ल और यथार्थ को चित्रित करने वाली रचना के लिए आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया ग़ज़लपोस्ट!

शालिनी कौशिक ने कहा…

shbdon me aapne ek muslim mahila ke man ke bhavon ko bahut gahrai se utara hai bahut sundar abhivyakti.badhai shikha ji

madhu singh ने कहा…

samatv evm samantabad ki sundar prastuti

भावना पाण्डेय ने कहा…

kuchh kuchh samjh to aya hai agarurdu ke shabdon ka arth mil jata to aur bhi achha lagata

Devdutta Prasoon ने कहा…

भावना का सही इज़हार !