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शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

आ ज मुंह खोलूंगी

'मुझे ऐसे न खामोश करें '

आ ज मुंह खोलूंगी मुझे ऐसे न खामोश करें ,
मैं भी इन्सान हूँ मुझे ऐसे न खामोश करें !

तेरे हर जुल्म को रखा है छिपाकर दिल में ,
फट न जाये ये दिल कुछ तो आप होश करें !

मुझे बहलायें नहीं गजरे और कजरे से ,
रूमानी बातों से न यूँ मुझे मदहोश करें !

मेरी हर इल्तिजा आपको फ़िज़ूल लगी ,
है गुज़ारिश कि आज इनकी तरफ गोश करें !

मेरे वज़ूद  पर ऊँगली न उठाओ 'नूतन' ,
खून का कतरा -कतरा यूँ न मेरा नोश करें  !                            

शिखा कौशिक 'नूतन'

7 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति रविवार के चर्चा मंच पर ।।

Arshad Ali ने कहा…

बेहतरीन लेखनी ...
दस्तुर खामोश करने का ...ख़त्म कर ज़ालिम
खुल कर कहने का उनका भी हक है

Amit Chandra ने कहा…

दिल को छुती बेहतरीन रचना.

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना | हृदय के सच्चे विद्रोह के भाव को प्रदर्शित करती |

ஜ●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬●ஜ
ब्लॉग जगत में नया "दीप"
ஜ●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬●ஜ

Asha Saxena ने कहा…

बहुत सुन्दर और भाव पूर्ण रचना है शिखा जी |
आशा

सतीश सक्सेना ने कहा…

वाह....

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बहुत खूब लिखा है .अभिव्यक्ति को जैसे पंख ही लग गए हैं .