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बुधवार, 21 नवंबर 2012

अपमानों के अंधड़ झेले ; छल तूफानों से टकराए


 
अपमानों के अंधड़ झेले ;
छल तूफानों से टकराए ,
कंटक पथ पर चले नग्न पग
तब हासिल हम कुछ कर पाए !


आरोपों  की कड़ी धूप में
खड़े रहे हम नंगे सिर ,
लगी झुलसने आस त्वचा थी
किंचित न पर हम घबराये !


व्यंग्य-छुरी दिल को चुभती थी ;
चुप रहकर सह जाते थे ,
रो लेते थे सबसे छिपकर ;
सच्ची बात तुम्हे बतलाएं !


कई चेहरों से हटे मखौटे ;
मुश्किल वक्त में साथ जो छोड़ा ,
नए मिले कई हमें हितैषी
जो जीवन में खुशियाँ लाये !


 धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !
                                        शिखा कौशिक 'नूतन'

[ मेरी शोध यात्रा के पड़ावों को इस भावाभिव्यक्ति के माध्यम से उकेरने का एक सच्चा प्रयास मात्र है ये ]





5 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !

जीवन बोध करातीं सुंदर प्रेरणादायी पंक्तियाँ...
शिखा जी, शोध यात्रा पूर्ण होने पर बहुत बहुत बधाई !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !

बहुत सुंदर भाव .... अच्छी रचना

उपासना सियाग ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 13 -12 -2012 को यहाँ भी है

....
अंकों की माया .....बहुतों को भाया ... वाह रे कंप्यूटर ... आज की हलचल में ---- संगीता स्वरूप

. .

Pankaj Kumar Sah ने कहा…


बहुत सुंदर बिल्कुल दिल को छूने वाली ...बधाई .आप भी पधारो
http://pankajkrsah.blogspot.com
स्वागत है