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मंगलवार, 7 अगस्त 2012

बदनाम जिन्दगी ...दर्दनाक मौत !

बदनाम  जिन्दगी  ...दर्दनाक  मौत  !


नैतिकता ; मर्यादा ; शुचिता ,
इन सबका दारोमदार है स्त्री पर 
फिर कैसे पार करती है वो लक्ष्मण रेखा ?
अग्नि परीक्षा देते शायद  
हर अगली ने पिछली सीता को नहीं देखा .

पुरुष सत्ताक समाज के बंधन 
तोड़ने के लिए ;
बन जाती है पुरुष ही के हाथ का खिलौना ,
अपनी खूबसूरत जिन्दगी को क्यों 
बना डालती है स्त्री घिनौना ?


नैना ; भंवरी ,फिज़ा हो या 
हो कविता -मधुमिता ,
पुरुष के हाथ की कठपुतली बन 
शीश पुरुष -चरणों   में ही क्यों   झुकता ?

महत्वाकांक्षाओं का गगन छूने के लिए 
क्या जरूरी था पुरुष का सहारा ?
वो खेलता रहा तुमसे ..तुम ही हारी सदा 
वो कभी ना हारा .

बदनाम जिंदगी ..दर्दनाक मौत 
का रास्ता तुमने ही चुना ,
पर एक प्रश्न तो अनुत्तरित  ही रहा  ,
नारी की गरिमा गिराने का हक़  जब 
पुरुष तक को नहीं फिर नारी 
को किसने दिया ?
                         शिखा कौशिक 
                        [विख्यात ]


2 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सचेत और सजग रहना भी आवश्यक है ,आगे बढ़ने के साथ साथ .....

शालिनी कौशिक ने कहा…

prabhavshali prastuti .blog jagat ke liye sangrahniy.aabhar
जन्म अष्टमी पर शुभकामनाएं |
अन्ना टीम: वहीँ नज़र आएगी