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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

है अगर कुछ आग दिल में ..

है अगर कुछ आग दिल में ;
तो चलो ए साथियों !
हम मिटा दे जुल्म को
जड़ से मेरे ए साथियों .
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रौंद कर हमको चला
जाता है जिनका कारवा ;
ऐसी सरकारों का सर
मिलकर झुका दे साथियों .
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रौशनी लेकर हमारी;
जगमगाती कोठियां ,
आओ मिलकर नीव हम 
इनकी हिला दे साथियों .
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घर हमारे फूंककर 
हमदर्द बनकर आ गए ;
ऐसे मक्कारों को अब 
ठेंगा दिखा दे   साथियों .
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जो किताबे हम सभी को 
बाँट देती जात में;
फाड़कर ,नाले में उनको 
अब बहा दे   साथियों .
****************
हम नहीं हिन्दू-मुस्लमान    
हम सभी इंसान हैं ;
एक यही नारा फिजाओं  में 
गुंजा दे साथियों .
*****************
है अगर कुछ आग दिल में 
तो चलो ए साथियों 
हम मिटा दे जुल्म को 
जड़ से मेरे ए साथियों .

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6 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

joshila aahvan.prerak prastuti.badhai.

यशवन्त माथुर ने कहा…

बहुत ही जोशीले अंदाज़ में लिखी गयी,सार्थक सन्देश देती कविता.

Anita ने कहा…

दिल में जोश का जज्बा भरने वाली एक वीररस की कविता !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

गर्जना और वर्जना के साथ में हुंकार है।
यह सुखनवर का बहुत ही विलक्षण हथियार है।।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

है अगर कुछ आग दिल में
तो चलो ए साथियों
हम मिटा दे जुल्म को
जड़ से मेरे ए साथियों

सुंदर ...सार्थक आव्हान...

Hindi Sahitya ने कहा…

'विख्यात' ब्लॉग का नया रूप आकर्षक है.बधाई!