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सोमवार, 15 नवंबर 2010

dev uthhan ekaadshi

हे लक्ष्मीपति   !   हे श्री नारायण  !
आज कार्तिक-मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी है;
चार मास   व्यतीत हुए;
शयन-समय समाप्त हुआ;
हे सृष्टि के पालनहार !
जाग जाइये !जाग जाइये!!
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असुरों क़ा संहार करिए;
हम सबका उद्धार करिए;
मिटा दीजिये अज्ञान-तम;
जीव-जगत को बना दीजिये सुदरतम;
कल्याण कीजिये  !!
हे करुणासागर  !!
जाग जाइये ! जाग जाइये!
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हम जानते है!
आपकी निद्रा ''योग-निद्रा'' थी;
जिसमे आप अंतस में
निहार रहे थे सम्पूर्ण  ब्रह्माण्ड   को ;
करते थे नियोजन तब भी;
प्रभु बलि के द्वार से
अर्थात  पाताल-लोक से
लौट आइये !
हे देव !! जाग जाइये ! जाग जाइये !!

4 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

आपकी निद्रा ''योग-निद्रा'' थी;
जिसमे आप अंतस में
निहार रहे थे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ;
करते थे नियोजन तब भी;

सच...... इस ईश्वरीय सत्ता को प्रणाम
बेहद सुंदर लिखा

यशवन्त ने कहा…

मिटा दीजिये अज्ञान-तम;
जीव-जगत को बना दीजिये सुदरतम;
कल्याण कीजिये !!

बहुत ही अच्छी भावनाएं!

ज़मीर ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

शिखा कौशिक जी
नमस्कार !
प्रभु !
बलि के द्वार से
अर्थात पाताल-लोक से
लौट आइये !
हे देव !! जाग जाइये ! जाग जाइये !!

अवश्य ही अब देवता जाग चुके हैं …

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार