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सोमवार, 1 नवंबर 2010

aao hum deepavali manayen

आओ हम दीपावली क़ा पर्व ऐसे मनाये;
दीप आशा के जगाकर; निराशा-तम को मिटाए.
हमारे मन में जो भी मैल हो द्वेष द्वन्द क़ा
रगड़-रगड़ के प्रेम -झाड़ू से usko हटाये.
ग़लतफ़हमी के सारे जाले साफ़ हम कर दे;
ख़ुशी के फूलों को फिर से खिलाएं.
हरेक स्त्री है luxmi बस इतना जान ले;
उसे देंगे सदा सम्मान;मन से ये कसम खाए.
न केवल कोठियों पर हो जगमगाहट;
हरेक झोपडी भी रोशिनी से अबके नहाये.
मिठाई बाटनी है अबके हमको  मीठे बोलों की;
रंगोली द्वार पर सुन्दर सी सजाएँ.
कंडील टांग दें अपने घरों पर सन्देश ये लिखकर;
अमन की हवा ही इसको hilaye.
जगे जब दीप समता क़ा  मिटाकर भेद पैसे क़ा;
अमावास की अंधरी रात भी पूनumकी हो जाये.

3 टिप्‍पणियां:

यश(वन्त) ने कहा…

बहुत ही अच्छी भावनाओं को कविता के रूप में उकेरा है.
दीवाली की शुभ कामनाएं!

shalini kaushik ने कहा…

deepawali manane ke vishay me shikha ji aapki soch bahut achhi hai.happy deepawali to you and your family.

shikha varshney ने कहा…

आमीन शिखा ! दिवाली ऐसे ही मनानी चाहिए.