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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

इंसानियत क़ा दरिया


किसी की आँख का आंसू
मेरी आँखों में आ छलके;
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले थमके;
किसी के जख्म की टीसों पे
मेरी रूह तड़प जाये;
किसी के पैर के छालों से
मेरी आह निकल जाये;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो,
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत क़ा दरिया तुम कर दो.
किसी क़ा खून बहता देख
मेरा खून जम जाये;
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस ओर बढ़ जाएँ;
किसी को देख कर भूखा
निवाला न निगल पाऊँ  ;        
किसी मजबूर के हाथों की
मैं लाठी ही बन जाऊं;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो,
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत क़ा दरिया तुम कर दो.

शिखा कौशिक 'नूतन' 

3 टिप्‍पणियां:

shalini kaushik ने कहा…

agar aise hi bhavon se har insan bhar jaye;
to is duniya se sara dukh hi mit jaye.
bahut achha prayas...kavita dil ko chho gayee.

यशवन्त ने कहा…

"....किसी के जख्म की टीसों पे
मेरी रूह तड़प जाये;
किसी के पैर के छालों से
मेरी आह निकल जाये;....."

वाह!...बहुत खूब!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

किसी को देख कर भूखा
निवाला न निगल पाऊँ ;
किसी मजबूर के हाथों की
मैं लाठी ही बन जाऊं;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो,
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत क़ा दरिया तुम कर दो.

सुंदर भावपूर्ण ......