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गुरुवार, 19 जून 2014

खंडित आनंद


सब विश्वास हो जाते हैं चकनाचूर ,
निरर्थक हो जाती हैं प्रार्थनाएं ,
टूट जाता है मनोबल ,
आस्थाओं में पड़ जाती है दरार ,
खाली-खाली हो जाता है ह्रदय ,
भर आते हैं नयन ,
मान्यताएं लड़खड़ा जाती हैं ,
उखड़ जाते हैं आशाओं के स्तम्भ ,
झुलस जाती है हर्ष की फुलवारी ,
वाणी हो जाती है अवाक,
बुद्धि हो जाती है सुन्न ,
मनोभावों की अभिव्यक्ति
हो जाती है असंभव ,
अब भी जिज्ञासा है शेष
ये जानने की कि कब ?
तो सुनो !
ऐसा होता है तब
जब खो देते हैं हम
अपने प्रिय-जन को
सदा के लिए ,
जो देह-त्याग कर
स्वयं तो हो जाता है
अनंत में लीन
और खंड-खंड
कर जाता है हमारा
आत्मिक-आनंद
जो कदापि नहीं हो सकता
पुनः अखंड !!

शिखा कौशिक 'नूतन' 

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