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रविवार, 9 दिसंबर 2012

''दोस्त आपकी ही हूँ ''

 

मुस्कुराने को कहूँ तो मुस्कुरा भी दीजिये ;
हाल जो पूछूं तुम्हारा ;गम सुना भी दीजिये ,
मैं नहीं उनमें से कोई ;
आये और आकर चल दिए ,
मैं जो आऊं घर तुम्हारे 
ठहराने  की जहमत कीजिये .
मैं नहीं पीती हूँ साकी ;
ये तुम्हे मालूम है ;
तो मुझे चाय क़ा प्याला  ;
शक्कर मिला कर दीजिये .
सोचते तो होगे तुम ;
कैसी ये बेशर्म है ?
रोज आ जाती है
अफ़साने सुनाने के लिए ;
''दोस्त आपकी ही हूँ ''
ये सोच कर सह लीजिये .
मुस्कुराने को कहूँ तो
मुस्कुरा भी दीजिये .
                           शिखा कौशिक 'नूतन '

6 टिप्‍पणियां:

madhu singh ने कहा…

nice creation****^^^^^*****रोज आ जाती है
अफ़साने सुनाने के लिए ;
''दोस्त आपकी ही हूँ ''
ये सोच कर सह लीजिये .
मुस्कुराने को कहूँ तो
मुस्कुरा भी दीजिये

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
। लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी है!
सूचनार्थ!

रचना दीक्षित ने कहा…

मुस्कुराने को कहूँ तो
मुस्कुरा भी दीजिये.

बात तो पते की कह रही हैं आप.

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आखिर मुस्कराना ही पड़ा ,बहुत खूब !
मेरी. नई पोस्ट @http://kpk-vichar.blogspot.in me aapka swagat hai.

Kailash Sharma ने कहा…

मुस्कुराने को कहूँ तो
मुस्कुरा भी दीजिये .

...मुस्कराना ही पड़ेगा...बहुत सुन्दर

Devdutta Prasoon ने कहा…

'नारी की अस्मत'रौंदने वाले 'मानवता' को रौंदते हैं|
ये 'पाप के अनुकारी''डाकू''धर्म' को लूटते हैं ||