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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कांपती इंसानियत


हर   तरफ   मायूसियाँ   ,चेहरों  पर उदासियाँ ,
थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !

कुदरती इन जलजलों से कांपती इंसानियत ,
उड़ गयी सबकी हंसी ;बस गम की हैं गहराइयाँ !

क्यूँ हुआ ऐसा ;इसे क्या  रोक हम  न सकते थे ?
बस इसी उलझन में बीत जाती ज़िन्दगानियाँ !

है ये कैसी बेबसी अपने बिछड़ गए सभी 
बुरा हो वक़्त ,साथ छोड़ जाती हैं परछाइयाँ !

जो लहर बन कर कहर छीन लेती ज़िन्दगी 
उस लहर को मौत कहने में नहीं बुराइयाँ !

हे प्रभु कैसे कठोर बन गए तुम इस समय ?
क्या तुम्हे चिंता नहीं मिल जाएँगी रुसवाइयां  !

शिखा कौशिक 

4 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

bhavnatmak prastuti

यशवन्त माथुर ने कहा…

बेहतरीन!

ehsas ने कहा…

है ये कैसी बेबसी अपने बिछड़ गए सभी
बुरा हो वक़्त ,साथ छोड़ जाती हैं परछाइयाँ !

शानदार रचना। बधाई स्वीकार करें।

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com/