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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

है अगर कुछ आग दिल में




 है अगर कुछ आग दिल में ;
तो चलो ए साथियों !
हम मिटा दे जुल्म को
जड़ से मेरे ए साथियों .
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रौंद कर हमको चला
जाता है जिनका कारवा ;
ऐसी सरकारों का सर
मिलकर झुका दे साथियों .
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रौशनी लेकर हमारी;
जगमगाती कोठियां ,
आओ मिलकर नीव हम 
इनकी हिला दे साथियों .
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घर हमारे फूंककर 
हमदर्द बनकर आ गए ;
ऐसे मक्कारों को अब 
ठेंगा दिखा दे   साथियों .
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जो किताबे हम सभी को 
बाँट देती जात में;
फाड़कर ,नाले में उनको 
अब बहा दे   साथियों .
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हम नहीं हिन्दू-मुस्लमान    
हम सभी इंसान हैं ;
एक यही नारा फिजाओं  में 
गुंजा दे साथियों .
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है अगर कुछ आग दिल में 
तो चलो ए साथियों 
हम मिटा दे जुल्म को 
जड़ से मेरे ए साथियों .

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4 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर विचार ...सकारात्मक आव्हान

यशवन्त माथुर ने कहा…

बहुत बढ़िया.

यशवन्त माथुर ने कहा…

ये आपकी आवाज़ है न....बहुत मीठी आवाज़ है आपकी.

निशांत ने कहा…

acchi composition
aur saarthak ..