सारा दिन घर में आराम से रहती हो !
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सारा दिन घर में रहती हो
तुम क्या जानो दुनिया के धंधे ?
मैं बाहर जाता हूँ
कितना थक जाता हूँ !
तुम तो आराम से रहती हो ;
एक बात पूछूं
तुम सारे दिन घर में करती क्या हो ?
सबसे पहले जागकर
घर की कर लेती हो झाड़ू-बुहारी ;
नहा-धोकर पूजा करती हो
फिर नाश्ते की तैयारी ;
झूठे बर्तन मांज देती हो ;
हमारा टिफिन लगा देती हो ;
फिर.......फिर ...जब मैं ऑफिस
और बच्चे चले जाते हैं स्कूल
तब ...तुम ..क्या करती हो ?
सारा दिन घर में आराम
से ही तो रहती हो .
दोपहर में मैले कपडे धोकर
सुखा देती हो ;
बच्चे स्कूल से लौट आते हैं
खाना बनाकर खिला देती हो ,
होमवर्क में उनकी मदद कर देती हो ,
इसके बाद ........इसके बाद ..
क्या करती हो ?
दिन भर घर में आराम से ही तो
रहती हो !
घर में आराम से रहने के बावजूद
जब मैं थका-हरा शाम को
घर लौटता हूँ तुम कुछ
थकी-थकी सी लगती हो ;
मैं फ्रेश होकर आता हूँ
तुम भोजन लगा देती हो ,
सूखे कपडे समेट लाती हो ;
उनपर स्त्री कर देती हो ,
शाम की चाय बनाकर
रात के भोजन की तैयारी में लग जाती हो ,
परोसती हो ,खिलाती हो
रसोई घर का सारा काम निबटाती हो
फिर...फिर....फिर ...
लेटते ही सो जाती हो
समझ में नहीं आता इतना ज्यादा
कैसे थक जाती ही ?
जबकि दिनभर घर में आराम से रहती हो !
शिखा कौशिक
8 टिप्पणियां:
:):) सही कहा है ..दिनभर आराम से ही तो रहती हो .. ये काम भी कोई काम हैं भला ...
यही मानसिकता है ..सारे काम करे कराये मिल जाते हैं तो दूसरे का काम .. काम नहीं लगता ..
बहुत सुंदर कविता, पहले मै भी यही सोचता था, लेकिन जब ध्यान से बीबी के काम को देखा ओर एक बार करना पडा तो समझ मे आई कि घर को सम्भालना भी इतना आसान नही:)
इस दुनिया की रीत ही ऐसी है!
बहुत सटीक व्यंग...
हूँ ऐसी दिनचर्या आराम ही तो है.......
पढ कर दिल खुश हो गया।
इतना आराम हमें तो पता है..
सच को बयान करती सुन्दर रचना शिखा जी... यह घर-घर का सवाल है... " आख़िर तुम करती क्या हो..??" बस इतने से काम में तुम कैसे थक जाती हो.. लेकिन इस इतने से काम की सूची कितनी लम्बी होती जाती है.. यह झलक दिखा दी आपकी कविता ने, शायद अब यह सवाल पूछने वालों को कुछ समझ में आये... कि हम आख़िर करती क्या हैं... :-)
सादर
मंजु
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