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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

सच कहूँ ... मुझे अच्छा नहीं लगता !


जब कोई टोकता है 

इतनी उछल कूद
मत मचाया कर 
तू लड़की है 
जरा तो तमीज़ सीख ले  
क्या  लडको  की  तरह  
घूमती -फिरती  है 
सच  कहूँ 
मुझे  अच्छा  नहीं  लगता  !

जब कोई कहता है 
तू लड़की है 
अब बड़ी हो गयी है 
क्या गुड़ियों से खेलती 
रहती है ?
घर के काम काज में 
हाथ बंटाया कर 
सच कहू 
मुझे अच्छा नहीं लगता !

जब कोई समझाता  है 
माँ को 
ध्यान रखा करो इसका 
जवान हो गयी है 
कंही कुछ ऊँच  -नीच 
न कर बैठे 
सच कहूँ 
मुझे अच्छा नहीं लगता !

पिता जी जब हाथ जोड़कर 
सिर-कंधें झुकाकर
लड़के वालों से करते 
हैं मेरे विवाह की बात 
हैसियत से ज्यादा दहेज़ 
देने को हो जाते है तैयार 
सच कहूँ 
मुझे अच्छा नहीं लगता ! 

ससुराल में जब 
सुनती हूँ ताने 
क्या दिया तेरे बाप ने ?
माँ ने कुछ सलीका नहीं सिखाया ?
सच कहूँ 
मुझे अच्छा नहीं लगता !

बेटा जन्मा ...थाल बजे 
उत्सव मनाया गया 
बेटी जन्मी ...मातम 
सा छा गया 
बेटे को दुलारा गया 
बेटी को दुत्कारा गया 
सच कहूँ 
मुझे अच्छा नहीं लगता !

मेरी बेटी भी 
उसकी होने वाली बेटी भी 
क्या यही सब सहती रहेंगी 
बस यही कहती रहेंगी ?
सच कहूँ 
मुझे अच्छा नहीं लगता !
  

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

शायद हर लड़की को यह सब अच्छा नहीं लगता होगा ...
विचारणीय रचना

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मन के गहरे भाव..... बेटियों को सच यह अच्छा नहीं लगता .....