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सोमवार, 21 मई 2012

मुझे लगता है मुझे याद कर माँ मुस्कुराई !


मुझे लगता है मुझे याद कर  माँ  मुस्कुराई !



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हूँ घर से दूर मेरे होंठों  पर हंसी आई ;
मुझे लगता है मुझे याद कर  माँ  मुस्कुराई  .

मैं घर से निकला सिर पर बड़ी सख्त धूप थी ;
तभी दुआ माँ की घटा  बन  कर  घिर  आई  .

मुझे  अहसास हुआ  माँ ने मुझे याद  किया ;
मुझे यकीन  हुआ जब मुझे हिचकी आई .

मेरे कानों में अनायास  ही बजने  लगी  शहनाई  ;
मेरी  तस्वीर  देख  माँ थी शायद गुनगुनाई .

मिली जब कामयाबी तेज हवा छू कर निकली ;
मेरी माँ की तरफ से पीठ मेरी थपथपाई .

मैं जाती जब भी माथा टेकने  मंदिरों  में ;
मुझे भगवान  में देती  है मेरी माँ दिखाई .


3 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

मिली जब कामयाबी तेज हवा छू कर निकली ;
मेरी माँ की तरफ से पीठ मेरी थपथपाई .
मैं जाती जब भी माथा टेकने मंदिरों में ;
मुझे भगवान में देती है मेरी माँ दिखाई ....
....MAA Jaisa aur koi ho bhi kaisa sakta hai..
bahut sundar pyari kavita!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह...!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Kailash Sharma ने कहा…

मिली जब कामयाबी तेज हवा छू कर निकली ;
मेरी माँ की तरफ से पीठ मेरी थपथपाई .

....माँ का प्यार और अहसास हर समय साथ रहता है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति...