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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कांपती इंसानियत


हर   तरफ   मायूसियाँ   ,चेहरों  पर उदासियाँ ,
थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !

कुदरती इन जलजलों से कांपती इंसानियत ,
उड़ गयी सबकी हंसी ;बस गम की हैं गहराइयाँ !

क्यूँ हुआ ऐसा ;इसे क्या  रोक हम  न सकते थे ?
बस इसी उलझन में बीत जाती ज़िन्दगानियाँ !

है ये कैसी बेबसी अपने बिछड़ गए सभी 
बुरा हो वक़्त ,साथ छोड़ जाती हैं परछाइयाँ !

जो लहर बन कर कहर छीन लेती ज़िन्दगी 
उस लहर को मौत कहने में नहीं बुराइयाँ !

हे प्रभु कैसे कठोर बन गए तुम इस समय ?
क्या तुम्हे चिंता नहीं मिल जाएँगी रुसवाइयां  !

शिखा कौशिक 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

माँ एक एक श्वास है



कोई मुझसे पूछता -फरिश्ते से मिली हो कभी ?
मैं उसे ये बोलती ''मै माँ से मिलकर आई  हूँ !

कोई मुझसे पूछता -तू कैसे खुशमिजाज है ?
मै उसे ये बोलती -''ये माँ का आशीर्वाद है .

कोई मुझसे पूछता -''क्या नहीं जन्नत की आरजू ?
मैं उसे ये बोलती -''मेरे पास माँ की गोद है .

कोई मुझसे पूछता -''देखा है खूबसूरत कोई ?
मैं उसे ये बोलती ''मेरी माँ से सुन्दर कौन है !

कोई मुझसे पूछता -''क्या है तू दौलतमंद भी ?
मैं उसे ये बोलती -''माँ की दुआएं साथ हैं .

कोई मुझ से  पूछता -''माँ से अलग क्या कुछ नहीं ?
मैं उसे ये बोलती -'' दिल की धड़कन है वही ,माँ एक एक श्वास है !
            शिखा कौशिक 

रविवार, 24 अप्रैल 2011

जो बिछड़ जाते हैं ..

जो  बिछड़  जाते  हैं  ..मेरी आवाज में 
जो बिछड़ जाते हैं हमेशा के लिए 
छोड़ जाते हैं बस यादों के दिए 
जिनकी रौशनी में उनका साथ पाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

जिन्दगी कितने काँटों से है भरी 
हर दिन कर रही हम सब से मसखरी 
जो चला था घर से मुस्कुराकर  के अभी 
एक हादसा हुआ और आया न कभी 
साथी राहों में ऐसे ही छूट जाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

रोज सुबह होती और शाम ढलती है 
जिन्दगी की यू ही रफ़्तार चलती है 
वो सुबह और शाम कितनी जालिम है 
जब किसी अपने की साँस थमती है 
हम ग़मों की आग में जिन्दा जल जाते हैं .
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .
              शिखा कौशिक 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

है अगर कुछ आग दिल में




 है अगर कुछ आग दिल में ;
तो चलो ए साथियों !
हम मिटा दे जुल्म को
जड़ से मेरे ए साथियों .
**************
रौंद कर हमको चला
जाता है जिनका कारवा ;
ऐसी सरकारों का सर
मिलकर झुका दे साथियों .
*******************
रौशनी लेकर हमारी;
जगमगाती कोठियां ,
आओ मिलकर नीव हम 
इनकी हिला दे साथियों .
*********************
घर हमारे फूंककर 
हमदर्द बनकर आ गए ;
ऐसे मक्कारों को अब 
ठेंगा दिखा दे   साथियों .
****************
जो किताबे हम सभी को 
बाँट देती जात में;
फाड़कर ,नाले में उनको 
अब बहा दे   साथियों .
****************
हम नहीं हिन्दू-मुस्लमान    
हम सभी इंसान हैं ;
एक यही नारा फिजाओं  में 
गुंजा दे साथियों .
*****************
है अगर कुछ आग दिल में 
तो चलो ए साथियों 
हम मिटा दे जुल्म को 
जड़ से मेरे ए साथियों .

****************** 

रविवार, 17 अप्रैल 2011

हद

'वंदना ' देख रितेश ने मुझे कितने सुन्दर कंगन दिए हैं ?''चहकती हुई सुमन की बात सुनकर वंदना थोड़ी नाराज होते हुई बोली ''....सुमन ये सब ठीक नहीं ...तू जानती है  ताऊ जी कितने गुस्से वाले हैं !..यदि उन्हें पता चल गया तू कॉलिज में किसी लड़के के साथ प्रेम लीला कर रही है वो तुझे जीते जी जमीन में गाड़ देंगे  और ताई जी तो कुछ बोलेंगी भी नहीं तेरे पक्ष में ...वो तो खुद घबराती हैं ताऊ जी से ....मेरी बात सुन रितेश से सब मतलब ख़त्म कर ले .....'' ''नहीं वंदना ...मैं रितेश के साथ धोखा नहीं कर सकती ' सुमन बात काटते  हुए बोली .........      ''तो मर .....' वंदना ने सुमन का हाथ झटका और उठकर वहां से चली गयी .अगले दिन वंदना कॉलिज गयी  तो पता चला कि सुमन कॉलिज नहीं आयी .अनजाने भय से उसका ह्रदय काँप गया .कॉलिज से लौटते  हुए वंदना सुमन के घर गयी तो पता चला कि वो कल ताऊ जी के साथ अपने मामा के घर चली गयी है .इस तरह एक महीना बीत गया फिर एक दिन वंदना के पिता जी ने घर लौटकर बहुत धीमे स्वर में बताया -''सुमन ने मामा के घर में आग लगाकर आत्महत्या कर ली कल रात .बहुत मुश्किल से मामला रफा-दफा हो पाया है पुलिस में वरना वे तो भाई साहब  को फंसा रहे थे कि उन्होंने मारा hai सुमन को .... उसे मार भी देते तो क्या ?घर की इज्जत सडको पर नीलाम  होने देते ?आखिर लड़की को अपनी हद में तो रहना ही चाहिए  !''आँखों -आँखों  में वंदना को भी धमका डाला था उन्होंने .

हद

'वंदना ' देख रितेश ने मुझे कितने सुन्दर कंगन दिए हैं ?''चहकती हुई सुमन की बात सुनकर वंदना थोड़ी नाराज होते हुई बोली ''....सुमन ये सब ठीक नहीं ...तू जानती है  ताऊ जी कितने गुस्से वाले हैं !..यदि उन्हें पता चल गया तू कॉलिज में किसी लड़के के साथ प्रेम लीला कर रही है वो तुझे जीते जी जमीन में गाड़ देंगे  और ताई जी तो कुछ बोलेंगी भी नहीं तेरे पक्ष में ...वो तो खुद घबराती हैं ताऊ जी से ....मेरी बात सुन रितेश से सब मतलब ख़त्म कर ले .....'' ''नहीं वंदना ...मैं रितेश के साथ धोखा नहीं कर सकती ' सुमन बात काटते  हुए बोली .........      ''तो मर .....' वंदना ने सुमन का हाथ झटका और उठकर वहां से चली गयी .अगले दिन वंदना कॉलिज गयी  तो पता चला कि सुमन कॉलिज नहीं आयी .अनजाने भय से उसका ह्रदय काँप गया .कॉलिज से लौटते  हुए वंदना सुमन के घर गयी तो पता चला कि वो कल ताऊ जी के साथ अपने मामा के घर चली गयी है .इस तरह एक महीना बीत गया फिर एक दिन वंदना के पिता जी ने घर लौटकर बहुत धीमे स्वर में बताया -''सुमन ने मामा के घर में आग लगाकर आत्महत्या कर ली कल रात .बहुत मुश्किल से मामला रफा-दफा हो पाया है पुलिस में वरना वे तो भाई साहब  को फंसा रहे थे कि उन्होंने मारा hai सुमन को .... उसे मार भी देते तो क्या ?घर की इज्जत सडको पर नीलाम  होने देते ?आखिर लड़की को अपनी हद में तो रहना ही चाहिए  !''आँखों -आँखों  में वंदना को भी धमका डाला था उन्होंने .