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बुधवार, 30 मार्च 2011

''सत्यमेव जयते ''

आंसू को तेजाब बना लो
इस दिल को फौलाद बना लो
हाथों को हथियार बना लो
बुद्धि को तलवार बना लो

फिर मेरे संग कदम मिलाकर
प्राणों में तुम आग लगाकर
ललकारों उन मक्कारों को
भारत माँ के गद्दारों को ,

धुल चटा दो इन दुष्टों को
लगे तमाचा इन भ्रष्टों को
इन पर हमला आज बोल दो
इनके सारे राज खोल दो ,

आशाओं के दीप जला दो
मायूसी को दूर भगा दो
सोया मन हुंकार भरे अब
सच की जय-जयकार करें सब ,

झूठे का मुंह कर दो काला
तोड़ो हर शोषण का ताला
हर पापी को कड़ी सजा दो 
कुकर्मों  का इन्हें मजा दो ,

सत्ता मद में जो हैं डूबे
लगे उन्हें जनता के जूतें
जनता भूखी नंगी बैठी
उनकी बन जाती है कोठी ,

आओ इनकी नीव हिला दे
मिटटी में अब इन्हें मिला दे
भोली नहीं रही अब जनता
इतना इनको याद दिला दे ,

हम मांगेंगे अब हक़ अपना
सच कर लेंगे हर एक सपना
आगे बढना है ये कहते
''सत्यमेव जयते -सत्यमेव जयते  ''




रविवार, 27 मार्च 2011

हे !चित्रकार-धिक्कार है

हे !चित्रकार
तुम्हे लज्जा नहीं आयी ?
जब तुमने एक स्त्री का
निर्वस्त्र चित्र बनाया ?

क्या उस समय
तुम्हें यह भी स्मरण
नहीं रहा कि
''तुम ''एक ''स्त्री ''
के गर्भ से उत्पन्न हुए हो ?

तुम्हरी तूलिका भी
तो स्त्रीलिंग है !
उसी से पूछ लेते
और कला को कलंकित
करने वाले
जरा इस पर भी
तो ध्यान देते
''कला की देवी भी
स्त्री है ''

धिक्कार है पुरुष की
इस सोच पर जो
स्त्री को निर्वस्त्र कर
अपना लक्ष्य साधता है
बस इसी तरह पुरुष
स्त्री के लिए बनाई गयी
हर सीमा को लांघता है ,

एक बात सुनो
तुमने विचारों को
लक्ष्य कर कोई कृति
क्यों नहीं बनाई,
तुम स्त्री देह में
ही उलझकर क्यों रह गए ?
तुम तो पुरुष हो न !
तुम्हारे पास तो मेधा
है ,स्त्री की तरह
तुम्हारी  अक्ल भी
घुटनों में चली गयी
थी क्या ?

तुमने वैसे कोई
नया काम तो नहीं
कर दिया जो तुमने
अपनी रचना को
प्रदर्शनी में
रख दिया ,
तुमने तो दुशासन
का ही अनुसरण किया है ,
'अरुंधती' को 'द्रौपदी '
की भांति जनता
की सभा में निर्वस्त्र
करने का प्रयास ,

फिर कहती हूँ
धिक्कार है तुम पर ,
तुम्हारी पुरुष सोच पर ;
तुम्हरी कला पर ;
तुमने ये दुष्कर्म किया
तुम्हरी माता ने
नौ माह तुम्हे
गर्भ में रखकर
व्यर्थ ही जन्म दिया !

बुधवार, 23 मार्च 2011

''प्रेम''

जिसके वशीभूत हो प्रभु ने जगत ये रच दिया ,
कृष्ण की बंसी बजी ;किसने इसको सुर दिया ,
हर ह्रदय में बस रहा वो भाव जो वरदान है ,
पवित्र व् कल्याणमय ''प्रेम ''उसका नाम है .

प्रेम की शक्ति से ही जगत का विस्तार है ,
हर मनुज उर में सदा बहती यही रसधार है ,
नलिनी सम सौन्दर्य युक्त ,आकार निराकार है ,
त्रिलोक की संजीवनी ,ये जगत आधार है .

गौरा बनकर अर्पणा हो गयी भोलेनाथ की ,
लक्ष्मी -नारायण मिले ,श्री राम संग हैं जानकी,
कृष्ण राधा के हुए,मीरा हुई घनश्याम की,
ये सभी साकार रचना प्रीति-प्रेम भाव की .

शब्दहीन जिसकी भाषा ,बोलते दो नैन हैं ,
कर्ण सुन रहे है किन्तु रसना जिसकी मौन है ,
जो प्रिया के मुख पे लाली बन विराजती ,
प्रेम की ये भावना रूप को निखारती .

द्वेष की खडग को जो आगे बढ़ के काटती ,
भेदभाव खाई को भली प्रकार पाटती   ,
पाप के समुंद्र में फंस गए यदि कभी 
पुण्य नौका बन के प्रीति भव निधि से तारती .

प्रेम अनल ,प्रेम अनिल, प्रेममय संसार है ,
प्रेम धरा,प्रेम गगन ,प्रेम जल की धार है ,
प्रेम श्रद्धा ,प्रेम मान,प्रेम सदाचार है ,
प्रेम दया ,प्रेम कृपा,प्रेम ही उपकार है.

होली आई -होली आई प्रेम रंग चढ़ गया ,
राखियों के रूप में कलाई पर है बंध गया ,
ईद के मौके पे आ गले जो लग गया ,
दीवाली रात में ये प्रेम दीप बन के सज गया .

त्याग और कल्याण ही जिस के पुण्य पुत्र है ,
करुना और उदारता जैसी न अन्यत्र है ,
जो 'अहम' से मुक्त ,सर्वत्र जिसका मान है ,
अमृत तुल्य 'प्रेम पितृ 'मानवता की पहचान है .

जो सखा ,जो प्रिय,जिसका ह्रदय में वास है,
श्वास-श्वास में रमा,जो अटल विश्वास है ,
जो सुगंध प्रसून की ,न बुझने वाली प्यास है ,
प्रेम मानव देह में प्रभु का अमर आभास है .

                शिखा कौशिक 
            http://shikhakaushik666.blogspot.com/             




गुरुवार, 10 मार्च 2011

'...जिनकी माँ नहीं होती .'

''हमारी हर खता को मुस्कुराकर माफ़ कर देती ;
खुदा नहीं मगर ''माँ' खुदा से कम नहीं होती .''

''हमारी आँख में आंसू कभी आने नहीं देती ;
कि माँ की गोद से बढकर कोई जन्नत नहीं होती .''

''मेरी आँखों में वो नींद सोने पे सुहागा है ;
नरम हथेली से जब माँ मेरी थपकी है देती .''

''माँ से बढकर हमदर्द दुनिया में नहीं होता ;
हमारे दर्द पर हमसे भी ज्यादा माँ ही तो रोती .''

''खुदा के दिल में रहम का दरिया है बहता ;
उसी कि बूँद बनकर ''माँ' दुनिया में रहती .''

''उम्रदराज माँ कि अहमियत कम नहीं होती ;
ये उनसे पूछकर देखो कि जिनकी माँ नहीं होती .''
                                           शिखा कौशिक
          

मंगलवार, 1 मार्च 2011

ॐ नमः शिवाय

आज ह्रदय से प्रभु तुम्हारा
अनुपम ध्यान मैं करती हूँ  ;
कलम बनेगी कमंडल मेरा
कविता से पूजा करती हूँ .
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प्रभु  आपके अनुपम रूप को
शब्दों में कैसे लिख दूँ ;
यही सोचकर ह्रदय में मेरे
असमंजस -सी रहती है .
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कोई तुमको भोला कहता
कोई कहता भूतनाथ  ;
मैं नाम तुम्हारा   क्या रख दूँ ?
तुम ही बतलाओ जगतनाथ .
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त्रिनेत्र हैं पास तुम्हारे   जब
मुझको क्यों जीवन -चिंता हो !
संकट मुझपर जब भी आये 
तब तुम ही सहायता करते हो .
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नीले रंग का यह गात प्रभु
आकाश सद्रश ही लगता है ;
हो  गगन तुम्ही या तुम्ही गगन 
कौतुहल हर पल रहता .
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मस्तक पर अर्ध -चन्द्र शीतल 
माँ गौरी बाएं विराज रही ;
नंदी अतिप्रिय तुम्हारे हैं 
गंगा जटा में है साज रही  .
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एक   बार प्रभु मुख दर्शन ही 
सारी पीड़ा हर लेता है ;
सर्पों का जोड़ा ग्रीवा में 
अति  अद्भुत शोभा देता है .
*********************** जय भोलेनाथ !