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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

खुदा का नूर ''माँ''





बड़े तूफ़ान में फंसकर भी मैं बच जाती हूँ ;
दुआएं माँ की मेरे साथ साथ चलती हैं .
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तमाम जिन्दगी उसकी ही तो अमानत है  ;
सुबह होती है उसके साथ ;शाम ढलती है .
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खुदा का नूर है वो रौशनी है आँखों की ;
शमां बनकर वो दिल के दिए में जलती है 
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नहीं वजूद किसी का कभी उससे अलग ;
उसकी ही कोख में ये कायनात पलती है .
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उसके साये में गम के ओले नहीं आ सकते ;
दूर उससे हो तो ये बात बहुत खलती है .
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मेरे लबो पे सदा माँ ही माँ  रहता है ;
इसी के  डर से  बला अपने आप टलती है .
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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

आँख का आंसू

ओ मेरी आँख के आंसू !
तू अपना धर्म निभाना ;
लगे जब ठेस इस दिल को
तभी तू आँख में आना .
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किसी को देखकर भूखा
तड़प जाये जो मेरा मन ;
किसी की बेबसी पर जब
करे मानवता भी क्रंदन ;
निकलकर तू उसी पल
मेरी पलकें भीगा जाना.
लगे जब ठेस इस दिल
को तभी तू आँख में आना .
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कोई अपना बिछड़ जाये
या मुझसे रूठ ही जाये ;
मेरा देखा हुआ हर स्वप्न  
झटके में बिखर जाये ;
मेरे दिल की तपन को
तू बरसकर ठंडा कर जाना ,
लगे जब ठेस इस दिल
को तभी तू आँख में आना .
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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

है अगर कुछ आग दिल में ..

है अगर कुछ आग दिल में ;
तो चलो ए साथियों !
हम मिटा दे जुल्म को
जड़ से मेरे ए साथियों .
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रौंद कर हमको चला
जाता है जिनका कारवा ;
ऐसी सरकारों का सर
मिलकर झुका दे साथियों .
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रौशनी लेकर हमारी;
जगमगाती कोठियां ,
आओ मिलकर नीव हम 
इनकी हिला दे साथियों .
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घर हमारे फूंककर 
हमदर्द बनकर आ गए ;
ऐसे मक्कारों को अब 
ठेंगा दिखा दे   साथियों .
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जो किताबे हम सभी को 
बाँट देती जात में;
फाड़कर ,नाले में उनको 
अब बहा दे   साथियों .
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हम नहीं हिन्दू-मुस्लमान    
हम सभी इंसान हैं ;
एक यही नारा फिजाओं  में 
गुंजा दे साथियों .
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है अगर कुछ आग दिल में 
तो चलो ए साथियों 
हम मिटा दे जुल्म को 
जड़ से मेरे ए साथियों .

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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

मेरे माँ -बाप है या ...फ़रिश्ते हैं !

ग़मों की आग में जलते हैं मगर हँसते हैं ;
मेरे माँ-बाप हैं या वो कोई फरिश्ते हैं .

किसी आफत की आंच भी नहीं आने देते ;
उनके साये में हम चैन से सो लेते हैं .

लुटा देते हैं हम पर ही जिन्दगी सारी ;
हमी संग हँसते हैं ,संग ही रो लेते हैं .

हमारी हर जरूरत क़ा वो कितना ख्याल रखते हैं ;
हमारे वास्ते आराम अपना छोड़ देते हैं .

हमे गर्मी की,बारिश की ,न जाड़े की हुई चिंता ;
हरेक मौसम को आगे बढकर वो खुद झेल लेते है .

हमारी बेतुकी बातों पर कितना ध्यान देते हैं ;
हमारे सब सवालों क़ा जवाब ढूंढ   लेते है .

सलीके से करो सब काम ,तरीका भी बताते हैं ;
उन्ही के साथ रहकर हम लियाकत सीख लेते हैं .

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन डे की हार्दिक शुभकामनायें

    १४ फरवरी को सभी वेलेंटाइन   डे मानते है .यह दिन है अपनों के प्रति अपनी हार्दिक शुभ भावनाओं   को प्रकट करने की .यह मात्र प्रेम की ,स्नेह की ,लगाव की अभिव्यक्ति   है.वेलेंटाइन  कोई भी हो सकता है .प्रेमी,प्रेमिका ,माता ,पिता ,मित्र .....सभी .सभी हमारे मन में विराजते है .प्रेम भाव में भगवान की उपस्थिति को हमारे महान कवि सदा  से मानते आये है .पवित्र  भाव  से किया गया प्रेम साथी को खुदा-फरिश्ते -प्रभु की संज्ञा तक दे डालता है .कबीर दास जी तो साफ़ कह ही गए हैं कि ''ढाई आखर प्रेम क़ा ....''.पवित्र भाव से इस दिन को समर्पित कीजिये अपने वेलेंटाइन को .कुछ इन्ही भावों को समेटे प्रस्तुत है यह ग़ज़ल --
''   वो इस तरह से मेरे करीब आता है
  मेरी सांसों में अपनी खुशबू घोल जाता है .

मैं नहीं डरता दुनिया की किसी ताकत से 
 एक यही बात मेरे सामने दोहराता है .

बड़ा मुश्किल है एक पल को उसे भूल जाना 
वो तो ख्वाबों में भी बेख़ौफ़ चला आता है .

वो मेरे वास्ते अब और क्या कर सकता है ?
हँस के वो मेरे आंसू भी पी जाता है .

उसके आने से लगता है कि मैं जिन्दा हूँ
वो मेरे सोये जज्बातों को जगा जाता है .

ग़मों की आग में जलने लगे जब मेरा मन
वो बनके साया तपने से बचाता है .

खुदा कहूँ या फ़रिश्ते क़ा उसे नाम दू
वो मेरा है ,वो मेरी रूह में समां जाता है ..''


                

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

एक प्रश्न

दहेज़- प्रथा पर
कितने ही निबंध
लिखें होंगें उसने;
कितना ही बुरा
कहा होगा;
लेकिन 'वो'
कली फिर से मसल
दी गई;
नाम 'पूनम' हो या 'छवि'
या कुछ और;
कब रुकेगा
कत्लों का
यह दौर?पूछती
है हर बेटी
इस मूक समाज से;
जो विरोध में
आते हैं दहेज़-हत्या के
क्या निजी तौर पर वे
भी नहीं लेते 'दहेज़'?
एक प्रश्न
जिसका नहीं है
आज किसी के पास
संतोषजनक जवाब....

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

जिन्दगी उदास है !

लाखों किसान हमारे देश में रोज अपनी जीवन-लीला समाप्त कर रहें है .कितना दुखद है ! इसे ही लक्ष्य कर मैंने यह कविता लिखी है -
     बुझ रही हर आस है ,
   टूटता विश्वास है ,
      खिलखिलाती मौत और
      जिन्दगी उदास है .
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अन्न क़ा दाता स्वयं
 एक ग्रास को तड़प रहा ,
मजबूरियों के  डंक से
अभाव सर्प डस रहा ,
 घुट रहा है दम
आती नहीं अब श्वास है ,
खिलखिलाती मौत और 
जिन्दगी उदास है .
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कट गए वो रेल से ,
जल गए वो आग में ,
रह गयी बस सल्फास
हाय इनके भाग में !
पी रही इनका लहू
सत्ता की कैसी प्यास है ?
खिलखिलाती मौत और
जिन्दगी उदास है .
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मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

अमर सुहागन !
हे!  शहीद की प्राणप्रिया
तू ऐसे शोक क्यूँ करती है?
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दुल्हन मांग को भरती है.
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श्रृंगार नहीं तू कर सकती;
नहीं मेहदी हाथ में रच सकती;
चूड़ी -बिछुआ सब छूट गए;
कजरा-गजरा भी रूठ गए;
ऐसे भावों को मन में भर
क्यों हरदम आँहे भरती है;
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दीपक में ज्योति जलती है.
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सब सुहाग की रक्षा हित
जब करवा-चोथ  -व्रत करती हैं
ये देख के तेरी आँखों से
आंसू की धारा बहती है;
यूँ आँखों से आंसू न बहा;हर दिल की
धड़कन कहती है--------
जिसका प्रिय हुआ शहीद यंहा
वो ''अमर सुहागन'' रहती है.